Friday, February 27, 2015

आज सिंह गुर्राया है

आज सिंह गुर्राया है
वन में गर्जन छाया है
छुपे श्वान सब अपने बिल में
एक नवयुग उदय कराया है

कर प्रहार, हुए अनेक वार
चोटिल हुआ है बारम्बार
पर अवसरवाद कर तुमने
केसरी को ललकारा है
आज सिंह जो दहाड़ा है
वन में गर्जन छाया है

करो प्रत्यक्ष पर पर्दा किन्तु
दर्पण आज दिख आया है
क्षीण भाव का परिचय बनकर
अपना स्तर तुमने गिराया है
फेर पंजा वनराज ने किन्तु
क्षद्मों को धूल चटाया है

आज सिंह गुर्राया है
वन में गर्जन छाया है
छुपे श्वान सब अपने बिल में
एक नवयुग उदय कराया है

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