Wednesday, April 22, 2015

Sheher - Ek Nazar

कभी जागते, तो कभी सोते देखा है
इस शहर को हमने ग़ुम होते देखा है  

ईमारतों के पीछे छुपे हुए वो बाग़
हवेलियों महलों के टूटते हुए टाट
अजी दो मंज़िले को ग्यारह मंज़िले से उलझते देखा है

इस शहर को हमने ग़ुम होते देखा है

मोटर और टांगों की खीँचातान भी है
शोर-ओ-ग़ुल में सुकूँ भी कहीं है
नवाबी शौकियों को भी ख़ार खाते  देखा है
इस शहर को हमने ग़ुम होते देखा है

सच का जामा ओढ़े झूठ को
बेपरवाह गश्त लगाते देखा है
तहज़ीब के दायरों में लिपटी
जिस्म की नीलामी को देखा है

रात के सन्नाटों को दिन में
हमने ग़ुम होते हुए देखा है
चाँद की चौदहवीं को कुछ यूं
अमावस से गले मिलते देखा है

बस, चंद लम्हात में हमने
कई ज़िन्दगियाँ गुज़रते देखा है
अजी सभी कुछ यहां होते हुए देखा है
इस शहर को हमने ग़ुम होते देखा है  

Sunday, April 5, 2015

कल रात यहाँ चाँद आया था

कल रात यहाँ चाँद आया था
कुछ ख़्वाबों से भरके झोली
गोया ज़मीन पे उतर आया था
कल रात यहाँ चाँद आया था

यहीं राह पर उस मुसाफ़िर को
हमने गश्त लगाते देखा था
जाने किस कूचे की फ़िराक़ में
यूँ रात की गहराई में
वो अचानक चला आया था
कल रात यहाँ चाँद आया था

चंद तारों को काली बुक्कल में
उसने नगीनों से जड़ रखे थे
उस बुक्कल की टाट खड़ी कर
झोली खोल उसने अपनी
ख़्वाबों का बाज़ार लगाया था
कल रात यहाँ चाँद आया था

कुछ निराश, कुछ हताश
और कुछ सुस्तायी आँखें
उससे नींद उधार ले गये थे
कुछ यादों ने भी उसी टाट में
अपना ठिकाना बनाया था
कल रात यहाँ चाँद आया था

लम्हों की गुज़ारिश थी
की कुछ देर और कारोबार चले
पर चाँद ख़ामोश इतराया था
और बिन कोई निशां छोड़
सेहेर की अंजान राह पे उसे
हमने ग़ुम होता पाया था

कल रात यहाँ चाँद आया था
कुछ ख़्वाबों से भरके झोली
गोया ज़मीन पे उतर आया था
कल रात यहाँ चाँद आया था

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