Tuesday, February 10, 2015

नव इतिहास को फिर दोहराएं

थका तन, निराश मन
अश्रु और लहु के कण
अनगिनत बार हमने बहाये
यत्नाग्नि में हारे जाएँ
स्वप्न असंख्य टूटे हर बारी
चिता बुझी छोड़ चिंगारी
रात्रि के अँधेरे घेरें
करें श्वान मृत्यु के फेरे
पथ प्रतिष्ठित मगर हैं त्यागे
पग पग कर बढ़ते हम आगे
आशा के सूरज की ओर
एक पग हम अब और बढ़ाएं
भय को अट्टाहास मान हम
व्यर्थ की चिंता दूर भगाएं
सिंह की भाँति जीवन को
अपना उपवन हम पुनः बनाएं
विजय पराजय संज्ञान करके
नव इतिहास को फिर दोहराएं

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