Friday, June 27, 2008

एक शहर था

हैदराबाद में आकर सब कुछ बदल गया है। क्या यह विधि का विधान कहा जा सकता है?शायद हाँ। किसको मालोम था के जो इंसान अपने घर से इतना जुदा हुआ था उसको एक अनजान शहर और अनजान लोगों के बीच जाकर रहना पड़ेगा?

यह शहर बड़ा ही निराला है। कई बातें तो बिल्कुल ही समझ नहीं आती हैं यहाँ के बारे में। लोगों का हज्जुम बनता जा रहा है यह शहर; न जाने और कितने लोग इसमें और समा पाएंगे। कुछ अजीब खासियत है इस शहर में-यहाँ समय अपनी ही रफ़्तार से चलने की जुर्रत करता है। किसी की परवाह नहीं करते समय और हालात यहाँ पर-सभी इसके यहाँ मोहताज लगते हैं।

यहाँ पर लोग भी बहुत अजीब तरह की खामोशी साधे हुए बैठे रहते हैं, मानो एक गुस्सा, एक उदासी, एक मांयुसी है अपने इस शहर की चरमराती हालत के ऊपर; मानो लोगों को इस शहर पर तरस आता है। एक नज़र भरकर तो देखना होता है सिर्फ़; और बाहर के लोगों को तुम अलग से पहचान पाओगे तुम। बस, अजीब सी बात है इस शहर की-वो तहजीब आज गायब लगती है कौमी परेशानियों के परदे के पीछे यहाँ पर; मुस्सल्मान और हिंदू लोगों के बीच एक दरार दिखती है, जो जल्द नहीं भरने वाली है। झंडों और मूर्तियों की राजनीति बहुत देखने को मिलती है इस शहर में। लगता है, मानो इस शहर में इंसान को कुछ ओ ना हो, इन दोनों चीज़ों को कुछ नहीं होना चाहिए। लोग कहतें है-एक शहर है; मैं कहता हूँ-एक शहर था, जो भीड़ के शोर-ओ-गुल में कहीं आज दफन हो गया है; जो गोलकुंडा के किले की दीवारों में कहीं चुन दिया गया है, जो रामोजी फ़िल्म सिटी की चकाचोंध में अंधा हो गया है। जो स्नो वर्ल्ड की नकली बर्फ के नीचे कहीं दब गया है, जो इस लगातार चलती भीड़ नें कहीं खो गया है।

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