Friday, May 30, 2008

फिर उठा परदा

फिर वही रात, वही बारिश

वही मिटटी की महक

और वही चमकती बिजलियों से रोशन आसमान

न जाने क्यों लगता है यह मनज़र नया सा हर बार

न तारों की चमक, न चाँद की रौशनी

फिर भी न जाने क्यों

खूबसूरत है ये बारिश का समा

न जाने क्यों ये बूँदें

किलकारियाँ मारते बच्चों को हसा देती है हर बार

न जाने क्यों

भीगे हुए कपडों में लहलहाती है वोही महक हर बार

लेकर एक नया रंग, एक नया अंदाज़

न जाने क्यों

बारिश की इस चादर को हिलाती ये मदमस्त हवा

बयान कर जाती है एक नया सुर, एक नयी ज़बान

न जाने क्यों

रात की वो आगोश बदल जाती है

न जाने क्यों

टिड्डों की किरकिट बंद और मेंद्कों की टर्र टर्र शुरू हो जाती है

न जाने क्यों

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