Monday, October 22, 2018

यादों की तकलीफ़

एक सूनापन है इस बेज़ार ज़िन्दगी में
एक अधूरापन का सीने में एहसास है
तेरी यादों का साया रहता है मुझपे हरदम
बस कैसे भी तेरे आने की एक अधूरी आस है

तुझसे जुदाई का दर्द तड़पाता है हर पल
तेरी आवाज़ फिर सुनने की एक चाह है
एक रोज़, हर रोज़ तू फिर मिल जाए मुझे
इस दिली ख़्वाहिश ने आज ली परवाज़ है

इस उजड़े चमन को कौन बाग़बान संभालेगा
जहाँ ग़म के काँटो से सजी अब हर एक रात है
कौन आएगा मेरे चश्मे नम को पोंछने आज
किस मरहम से रुकता ज़ख्म से रिसता लहू है

एक सूनापन है इस बेज़ार ज़िन्दगी में
एक अधूरापन का सीने में एहसास है
तेरी यादों का साया रहता है मुझपे हरदम
बस कैसे भी तेरे आने की एक अधूरी आस है

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