वो घर ढूँढता हूँ
वो घर ढूँढता हूँ, जहाँ पर सूकून था
जहाँ पर ख़ुशी थी, जहाँ प्यार भी था
जहाँ की दीवारें चमकती सुबह को
जहाँ शाम में भी वो दिल रोशन था
वो घर ढूँढता हूँ....
जहाँ की दोपहरों में थीं ढेरों कहानी
जहाँ रात में टिर्री देती आवाज़ें
जहाँ सर्दियों में छुपा था वो आलस
जहाँ भीगती बारिशों में वो खिड़की
वो घर ढूँढता हूँ....
जहाँ दोस्तों के साथ खेले थे कंचे
वो सड़कें जहाँ दौड़ते हँसते हँसते
जहाँ पर थे छुपने को ढेरों किनारे
वो पेड़ों के पत्ते, वो जीने की सीढ़ी
वो घर ढूँढता हूँ....
वो छोटे से घर का बड़ा सा वो बाड़ा
जहाँ गर्मियों में छिड़कते थे पानी
वो सर्दी के दिन छत पर लेटे ही रहना
वो अमरूद और संतरों का यूँ छीलना
वो घर ढूँढता हूँ....
वो घर का रस्ता आज भी याद मुझको
बहुत रातों में वो है सपनों में दिखता
ज़हन से वो घर का मरासिम न मिटता
वो भरपूर खुशियों का एक आशियाँ था
वो घर ढूँढता हूँ....
जो आज मैं लेता हूँ आखिरी साँसें
मैं कहता हूँ सबसे, मुझे सुनने वाले
घड़ी भर सही ही, तू ले चल वहाँ पे
जहाँ हैं वो गालियाँ, जहाँ हैं वो आले
वो घर ढूँढता हूँ....
ये अज़मत, ये दौलत मुझे नागवारा
ये सब एक धोखा, ये सब है छलावा
मुझे कोई लौटा दो बचपन का आँगन
जहाँ ले सकूँ चैन की अब दो साँसें
वो घर ढूँढता हूँ....
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