मिट्टी के दीए


सरजू निराशा के बादलों से घिरा बैठा था। दीवाली की दोपहर हो गयी थी, और अभी भी सरजू के ठेले से सामान ज्यों का त्यों पड़ा हुआ था।  बड़ी आस से उसने इस साल सोचा था के मैं कुछ काम करूँगा, अपने पैरों पर खड़ा होकर दिखाऊंगा अपने माँ बाबा को। पर अब वो किस मूँह से वापिस घर जाता ये सब सामान लेकर? सुना था, दीवाली सबके घर सुख, रोशनी और समृद्धि लेकर आती है, लेकिन इस वर्ष उसके घर में तो बस अंधकार और दुःख छाने वाला था।


मंदी के दौर में घर में रोटी के लिए कुछ पैसे भी नहीं बचे थे। सरजू नाकारा था, अपने आप को इस तरह घर पर बैठा देख के बारी उसे खुद से घृणा होने लगती थी। हठ के चलते पहले विद्यालय में कुछ मेहनत न करी, और फिर एक दिन बस घर बैठ गया यह कहकर के अब मेरा मन न लगता। माँ बाप दो जून की रोटी कमाने में इतने व्यस्त थे के उन्हें उसे समझाने का भी वक़्त न था। बस एक बार डाँट कर, एक बार फुसला कर हार मान लिए। और वैसे भी तो छोटी बहनें थी, जिनको पालने से उतरे अभी दिन ही कितने हुए थे - कमसकम वो घर पर उन्हीं का ध्यान रख लेगा। लेकिन मंदी ने उन्हें भी नाकारा बना दिया।


अति तो तब हो गयी जब उस दिन घर में आटा भी ख़त्म हो गया। राशन की दुकान कैसे जाए, प्रवासी मजदूर जो ठहरे? वो जो इस महानगर की ऊंची ऊंची इमारतें बनाने के लिए अपना सब कुछ लुटा आए, अपना घर बार छोड़ आए थे, उनको इस महानगर ने एक पहचान भी नहीं दी थी। बस, एक आँकड़ा बना छोड़ दिया था इस शहर ने एक और गरीब प्रवासी के नाम का। पड़ोस की विमला मौसी से उसकी माँ आटा मांग तो लायी, लेकिन कब तक ऐसे चल सकता था? भूख से रोते बच्चों की चीखें और पिता के लाज को छिपात्र गुस्से के बीच सरजू की माँ चुप चाप पिसती रही। और सरजू को उनकी परिस्थितियों के काँटे बिच्छु से बार बार दंशते रहे। मोहल्ले के एक पनवाड़ी से उसने जब उधार माँगा, तो पहले तो पनवाड़ी ने उसे झट से मना करा। कहता - सरजू तू नाकारा है, तू कैसे लौटाएगा? तेरे माँ या पिता माँगते तो समझ भी आता, पर तू? बड़ी मिन्नतें करने पर पनवाड़ी मान तो गया, लेकिन उसने ब्याज दोगुना कर दिया। आखिरकार दे भी तो एक नाकारा को रहा था, उम्मीद ही क्या थी के वो लौटायेगा?


दीवाली भी आ गयी, और पनवाड़ी की शंका सच होती दिखाई दे रही थी। ये दीए, ये तेल, ये बाती - कुछ भी नहीं बिक रहा था। आस पास के रेहड़ियों और ठेलों से लोग वो मोम वाले दीए लेने में जुटे थे, वो रंगीन दीए खरीदने में व्यस्त थे, और उसके सादे दीयों के लिए उनके पास समय, इच्छा व रुचि भी न थी। दोपहर के सारे पहर समाप्ति की ओर चल पड़े थे, लेकिन दीये उसका साथ छोड़ने को तैयार न हुए। सरजू के मन में उदासी और पीड़ा जाग उठी। अब अंधेर की ओर रात चल पड़ी थी, लेकिन कोई पूछने वाला भी न था। रेहड़ी पर सब सामान ज्यों का त्यों पड़ा था, और सरजू की आंखों में अब गुस्सा और उदासी दोनों ने जगह घेर ली थी। 


सुना था उसने माँ से के दीवाली के दिन अपने घर वापिस आए थे प्रभु राम। उस दिन अमावस का अंधेरा मिटाने के लिए अयोध्या के लोगों ने दीये प्रज्वलित किये थे। लोग तो उन्हीं के लौटने की इसी स्मृति को जीवंत रखने के लिए आज भी वो रीति निभाते हैं। प्रभु तो हर किसी की इच्छा पूरी करते हैं, वे तो सभी के तारन हार हैं, कमज़ोर का साथ देने वाले हैं, पर आज उन्हें कोई प्रभु का साथ मिलने की आस नहीं थी। सरजू को दुःख हो रहा था, और रेहड़ी लेकर वो चल पड़ा था अपने घर। पता नहीं किस मूँह से वापिस जाऊँ, यही सोच कर सरजू चला जा रहा था अपनी रेहड़ी लेकर। 


एकदम से एक परिवार सामने से आते देखा सरजू ने। हैरानी की बात ये थी के वो आपस में खूब खुश और हँसी ठिठोली करते हुए दीवाली का आनंद उठा रहे थे। उनके साथ के बच्चे ने एकदम से सरजू की ओर देखा और अपने माँ बाप से कुछ बात करने लगा। माँ बाप , साधारण से लगने वाले लोग लग रहे थे, पर कुछ था उनमें जो सरजू का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो रहा था। इससे पहले के वो कुछ समझ सकता, वो सारे लोग - चार के करीब लोग थे वो - पास आकर उससे बात करने लगे। 


"भैय्या, ये बेटा हमारा हठ कर रहा है के आप ये दीये उसे दे दें।"


सरजू को थोड़ा अचम्भा हुआ। दीए दे दो? ये कैसे हो सकता है? "अर्रे साहब, अब समय हो चुका है। घर जाकर हमको भी दीवाली मनानी है! आप कुछ देर पहले आते तो..."


"अरे भैय्या, आप आती लक्ष्मी को ठुकरा रहे हो?" एकाएक उस गुट में एक महिला सदस्या मुस्कुराते हुए बोल पड़ी। "आज दीवाली है, आपको कुछ लक्ष्मी वक्ष्मी की आवश्यकता है के नहीं?"


सरजू को चुप्पी ने घेर लिया। बहनजी कह तो सही रही हैं, लेकिन दस एक रुपया से अब क्या होगा उसका? इतने बड़े कर्ज़े के सामने ये दस रुपए क्या हैं? 


"भैय्या, मान जाइए न!"


एकदम से सरजू ने बच्चे की ओर देखा। उसकी आँखों में एक प्रार्थना भाव था जो दिल को पिघला दे, और ऐसे मासूम चेहरे को मना कर पाना कठिन होता। सरजू को अपने छोटे भाई की याद आ गयी, उसके चेहरे की मुस्कान याद आ गयी। और फिर होना क्या था - मन पिघल गया।


"चलिए, ठीक है, बताइए कितने दीए चाहिए आपको?" सरजू ने छह दीये उठा कर कागज़ में लपेटना शुरू किया। 


"भैय्या, सारे दीए चाहिए," बच्चा बोल पड़ा। 


"सारे दीये?" सरजू चौंक पर पूछ पड़ा। ये क्या हो रहा था? कोई मज़ाक कर रहे होंगे ये लोग। इन दो सौ दीयों को कोई एक साथ कहाँ खरीदता है! 


"बेटा, सही सही बताओ, देर हो रही है, और मज़ाक का समय न है मेरे पास," सरजू ने कुछ खीज कर कहा।


"भैय्या," गुट में स्थित उस दूसरे आदमी ने कहा, "जो बोल रहा है वो करिए, मज़ाक नहीं कर रहे।"


सरजू को विश्वास नहीं हो पा रहा था। आज दीवाली के दिन उसको सही में भगवान ने आशीर्वाद सा दे दिया। आज उसने अपने परिवार को दो वक़्त की रोटी मुहैय्या करवा दी! सच में ये लोग भगवान से कम न थे। सरजू ने खुशी खुशी कहा , "हाँ हाँ, ले लीजिए! सारे ले।लीजिए! बताइये साहेब, कहाँ पहुंचवाने हैं? मैं खुद ही पहुँचाये देता हूँ!"


बच्चे ने उन तीन वयस्कों को देखा, और बाजू वाले मंदिर की ओर इशारा कर दिया। "पर एक शर्त है भैय्या। दीए आप जलाने में सहायता करोगे, और तेल भी आप ही दोगे!"


तेल! तेल तो सरजू के पास पर्याप्त मात्रा में नहीं था। एकाएक सरजू के चेहरे पर उदासी ने बादल कर लिया। ये कैसी मजबूरी है प्रभू? तेरे ही दरबार में भूखे के साथ ऐसा खिलवाड़, ऐसी परीक्षा? मंदिर के सामने हो रहे इस वार्तालाप ने सरजू के मन में आँसू निकाल दिए। ऐसा संभव ही नहीं था। वो हामी कैसे भरता?


"हाँ कहो आप भैय्या, हम अभी खरीद लेते हैं," पहले सज्जन व्यक्ति ने बड़े प्रेम भाव से कहा। 


"पर बाऊजी, तेल की तो दो ही बोतल थी मेरे पास," सरजू ने आँख चुराते हुए कहा। आँसू किसी को भी क्यों दिखाए जाएं, खास तौर पर किसी अपरिचित को?


"भैय्या, हाँ कर दो, ये तेल पर्याप्त पड़ेगा। हाँ तो कहिए!" वो दूसरे व्यक्ति ने उसे इशारा किया। 


अब सरजू असमंजस में चला गया। क्या करें? आज कमाई का जो एक माध्यम आया वो भी ऐसी बात बोल पड़ा के सब संभावनाएं समाप्त हो गई। लेकिन करें भी तो क्या? सामान वापिस लौटा कर रुपया भी तो वापिस नहीं लिया जा सकता था! और आज दीवाली की रात हो रही थी, उसे कुछ अवसर भी नहीं थे मनाने के, न ही कारण थे। करें तो क्या करें?


न जाने क्यों सरजू को एकदम से इच्छा हुई ये बात मानने की। "ठीक है बाऊजी, ठीक हसि बेटा, चलो मंदिर के अंदर," सरजू ने स्वीकारा। "आगे राम जी बेड़ा पार कराएंगे। आज मेरा सब कुछ उन्हीं को अर्पण।"


इतना कह डाब मंदिर में घुसे। प्रांगण में रोशनी की लड़ियाँ थीं, पर आंगन और मंदिर का गर्भ बिन दीयों के कुछ खाली से लग रहे थे। सरजू को यह देख दुःख हुआ - यह संस्कार और परंपरा कहां जा रही थी के एक दीए को जलाने को भी कोई न था? मंदिर खाली पड़ा था, पुजारी भी कहीं दिखाई नहीं दिख रहा था। 


सरजू ने एक दीए को हाथ में उठा कर मन से प्रार्थना करी। भगवान, अगर आप साथ दो, तो ये सारे दीए कैसे कर जल जाएँ।


"जय श्री राम," सरजू ने हल्के से बोल तेल बाती लगा दीए को जला कर तुल्सी महारानी की ओढ़ में रखा। 


"जय जय श्री राम!" वो छोटे बालक ने जोर से नारा लगाया, और चारों ने मिलकर दीए तेल और बाती से सजाकर जलाने आरम्भ किए। 


सरजू को विश्वास नहीं हो रहा था, पर एक ही बोतल तेल से सारे दीये भर गए। नहीं, कुछ तो गड़बड़ है, सरजू सोचता रहा। यह सम्भव नहीं!  पर दीये उसके सामान उस असम्भव का प्रत्यक्ष प्रमाण बन उसको प्रश्न पूछ रहे थे। चारों ओर दीये ओजस और एज की लौ प्रकाशमान कर रात्रि के अंधकार को मानो चीर रहे थे, उससे वार्ता कर, उसे समझा कर परे कर रहे थे। मात्र चार दीये शेष रह गए थे, के एकाएक वे चारों वापिस ठेले पर आए। सबसे बड़े लगने वाले वयस्क सज्जन ने अपनी जेब से कुछ रुपए निकाले, और अपनक श्रीमती को दिए। "जाइये, आप दीजिए," ये कहकर सब उनकी ओर चले। 


सरजू को एकाएक लगा के ये लोग कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकते। एक चमत्कार उसकी आँखों के सामने आज हुआ था। वह स्वयं एक पुण्यकारी कार्य का भागी बना था, और वह भी तब जब उसने अपनी दरिद्रता से पनपे लालच को परे रखा। आज जब उसने मेहनत कर दो जून की रोटी कमाने की ठानी तो भगवान ने यह दूत भेज उसकी इच्छा का मान रखा, उसके विश्वास का मान रखा। अब यह रुपए लेते हुए उसे लाज आने लगी। 


"नहीं नहीं मेमसाहब! हम ये कैसे स्वीकार लें? हमसे न हो पाएगा!"


"सरजू, यह तुम्हारा मेहनताना है, और इन दीयों का मूल्य। बस शेष कुछ नहीं। आती लक्ष्मी कभी नहीं ठुकराते," इतना कहकर उस महिला ने उसके हाथ में बिन देखे कुछ रुपयों को उसके फटे कुर्ते की जेब में रखा। "अब बस यह चार दीए हैं, इन्हें गर्भ में लगवा दो। हम भी आशीर्वाद के भागी बन सकें।"


सरजू ने जैसे ही दीये जलाए, बिजली गुल हो गयी। दीवाली की रात को ऐसा काम ही होता था, लेकिन दीयों की रोशनी ने मंदिर को एक पवित्र आभा से घेर लिया था। ज्योति के एक महापुंज मे मानो मंदिर की पवित्रता को और भी शोभायमान कर दिया था, और अयोध्या में अमावस्या को भगा देने वाले उस पावन रात्रि की आभा का भाव प्रतीत करवा दिया। तभी पुजारी जी आए, तो सरजू ने उन्हें बताया के उनके साथ क्या हुआ। 


पुजारी जी के आंखों से अश्रु बहने लगे। भगवन के घर देर है, पर अंधेर नहीं, आज उन्होंने ने भी उसका साक्ष्य देख लिया। आनन्द से ओत प्रोत पुजारी ने झट से वह दीए लिए और सरजू को साथ ले गर्भगृह में प्रवेश किया। एक एक कार वे दीए उन्होंने वहाँ स्थित श्रीराम, माता जानकी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी को समर्पित किया।


दीयों के प्रकाश में सरजू ने जब श्रीराम और माता जानकी की मूर्तियों के मुस्कराते चेहरों को देखा, तो स्तब्ध रह गया। 


उनके चेहरे तो वो सज्जन और महिला जैसे ही जान पड़ रहे थे।


उसने लक्ष्मण जी और हनुमान जी की ओर जब देखा, तो वो अवाक रह गया। सब वही चेहरे थे। हड़बड़ाते हुए उसने अपनी जेब में हाथ डालकर जब रुपए देखे, तो पाया के इतने रुपए तो उसने तो अपने जीवन में कभी भी न देखे थे। 


सरजू आँखों से बहते अश्रुओं ने प्रज्वलित दीयों के ओजस को और भी तेजपूर्ण बना दिया। 


उस रात, वो मंदिर सरजू के लिए रामराज्य का एक छोटा सा भूभाग बन गया था।

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