Pehchaan

आज 
मन दर्पण में जो झाँका तो पाया
के मेरी पहचान धुंधली हो चली है
वो धुंधली आकृति कहीं
प्रतिबिम्ब के कोने में उदास दुखी बैठी है 
न जाने क्यों ऐसा है के वो कुछ बोलती ही नहीं है
बस टकटकी लगाए द्वार की ओर देखती रहती है 
न जाने किसकी प्रतीक्षा है मेरी पहचान को
शायद
मेरे अस्तित्व की    

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