Sunday, October 9, 2011

Pehchaan

आज 
मन दर्पण में जो झाँका तो पाया
के मेरी पहचान धुंधली हो चली है
वो धुंधली आकृति कहीं
प्रतिबिम्ब के कोने में उदास दुखी बैठी है 
न जाने क्यों ऐसा है के वो कुछ बोलती ही नहीं है
बस टकटकी लगाए द्वार की ओर देखती रहती है 
न जाने किसकी प्रतीक्षा है मेरी पहचान को
शायद
मेरे अस्तित्व की    

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